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Arjuna Vishada Yoga
47 verses
Chapter 1 • Verse 30
Arjuna Vishada Yoga
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||१-३०||
gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate . na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ ||1-30||
🌸 Hindi Translation
।।1.28 -- 1.30।। अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ।
— Swami Ramsukhdas