📚 Navigation

← All Chapters
Current Chapter
Vishvarupa Darshana Yoga
55 verses
Chapter 11 • Verse 41

Vishvarupa Darshana Yoga

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति | अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ||११-४१||

sakheti matvā prasabhaṃ yaduktaṃ he kṛṣṇa he yādava he sakheti . ajānatā mahimānaṃ tavedaṃ mayā pramādātpraṇayena vāpi ||11-41||

🌸 Hindi Translation

।।11.41 -- 11.42।। आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए 'मेरे सखा हैं' ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक (बिना सोचे-समझे) 'हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखे !' इस प्रकार जो कुछ कहा है; और हे अच्युत ! हँसी-दिल्लगीमें, चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते समयमें अकेले अथवा उन सखाओं, कुटुम्बियों आदिके सामने मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार किया गया है;  वह सब अप्रमेयस्वरुप आपसे मैं क्षमा माँगता हूँ।

— Swami Ramsukhdas

PreviousNext