📚 Navigation

← All Chapters
Current Chapter
Gunatraya Vibhaga Yoga
27 verses
Chapter 14 • Verse 25

Gunatraya Vibhaga Yoga

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः | सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ||१४-२५||

mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ . sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate ||14-25||

🌸 Hindi Translation

।।14.25।।जो धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रिय-अप्रियमें तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है; जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

— Swami Ramsukhdas

PreviousNext