📚 Navigation
← All Chapters
Current Chapter
Raja Vidya Guhya Yoga
34 verses
Chapter 9 • Verse 15
Raja Vidya Guhya Yoga
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते | एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ||९-१५||
jñānayajñena cāpyanye yajanto māmupāsate . ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham ||9-15||
🌸 Hindi Translation
।।9.15।। दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेद-भावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्ररुपकी अर्थात् संसारको मेरा विराट्ररुप मानकर (सेव्य-सेवकभावसे) मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं।
— Swami Ramsukhdas